Tuesday, October 02, 2007

गर्भावस्था के दौरान सेक्स

इस विषय पर काफी जटिलताएं भरी हुई हैं. गर्भधारण के साथ ही तरह-तरह के मिथक सेक्स को लेकर बताएं जाने लगते हैं वहीं ज्यादातर पुराने लोग गर्भावस्था के दौरान सेक्स न करने की सलाह देते नजर आने लगते हैं . गर्भावस्था के दौरान सेक्स के बारे में कम बाते की जाती हैं क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक मानसिकता में घुला हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान सेक्स नहीं करना चाहिए. लेकिन वास्तविकता में ऐसा कुछ है नहीं. यह अलग है कि इस दौरान कुछ सावधानियां जरूर बरतनी चाहिए. इसलिये जरूरी है इस मिथक की वास्तविकता को जानकर गर्भावस्था के दौरान भी अपनी सेक्स लाइफ आनंददायी बना सकते हैं.
यहां यह बात सबसे पहले समझ लेनी चाहिये कि सेक्स और सेक्सुअलिटी दोनों में काफी अन्तर है. और जब तक संतुष्टिदायक सेक्स नहीं किया जाता है तब तक सेक्सुअलिटी में होने वाली बढ़ोत्तरी परेशान करती रहती है. यह स्थितियां गर्भावस्था के दौरान भी होती है. इसलिये जरूरी है कि गर्भावस्था के दौरान भी सेक्स किया जाए लेकिन गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण होती है. इस अवस्था में सेक्स के लिये कुछ बाते हैं जिनका ध्यान रखना जरूरी है-
1\. सेक्स के दौरान ज्यादा से ज्यादा कोशिश होनी चाहिये कि पेट पर दबाव कम से कम हो.
2\. इस दौरान गहराई तक प्रवेश वाली सेक्स पोजीशनों से बचना चाहिये साथ ही वह पोजीशन अपनाना चाहिये जो गर्भवती के लिये आरामदायक हो.
3\. सेक्स या सेक्स पूर्व क्रीड़ा के दौरान योनि में पानी , हवा या किसी भी बाह्य वस्तु के प्रवेश से बचना चाहिये. इस अवस्था में योनि को नल धावन से बचाना चाहिये.
4\. इस अवस्था में महिला को सेक्स के दौरान हमेशा ‘ना’ कहने का अधिकार है.
5\. यदि समय पूर्व प्रसव की संभावना हो तो कामोन्माद व सेक्स से बचना चाहिये. इस दौरान निप्पल की उत्तेजना से बचना चाहिये.
6\. यदि उल्बीय (amniotic) द्रव रिस रहा हो तो सेक्स नहीं करना चाहिये.
7\. यदि किसी भी तरीके से महिला की इच्छा सेक्स के लिये नहीं है तो सेक्स नहीं करना चाहिये.
8\. यदि इस दौरान मुख मैथुन कर रहे हों तो अपने पार्टनर को यह पहले बता दें कि वह योनि में फूंक न मारे. क्योंकि योनि में हवा जाने से आगे की रक्त वाहिनियों के रक्त में हवा का बुलबुला बना कर उन्हें बाधित कर सकती है. जो मां और होने बाले बच्चे दोनों के लिये हानिकारक हो सकता है.
9\. किसी भी तरह की संक्रामित बीमारी होने पर सेक्स बिल्कुल नहीं करना चाहिये.
10\. यदि प्लेसेंटा नीचे है तो भी सेक्स नहीं करना चाहिये क्योंकि यह गर्भाशय के मुंह द्वारा ढंका होता है और नीचे होने पर हल्का सा भी धक्का प्लेसेंटा को क्षतिग्रस्त कर सकता है, इससे प्लेसेंटा से रक्तस्राव हो सकता है.


किस महीने तक सुरक्षित है सेक्स करना

गर्भावस्था के दौरान प्रसव के कुछ दिनों पूर्व तक सेक्स किया जा सकता है. गर्भावस्था के दौरान तभी सेक्स नहीं कर सकते जब जब चिकित्सक ने किसी विशेष बीमारी, शारीरिक कमी या अन्य कारणों से सेक्स के लिये मना किया हो. यह अलग बात है कि गर्भावस्था के जैसे-जैसे दिन गुजरते जाते हैं सेक्स पोजीशन में बदलाव करते जाना चाहिये. वैसे गर्भावस्था के द्वितीय चरण अर्थात 14 से 28 वें सप्ताह तक सेक्स करना सबसे बेहतर होता है क्योंकि इस दौरान स्तनों में भराव आने से वे उत्तेजन दिखने लगते हैं तथा उत्तेजना का संचार ज्यादा होता है, इस दौरान योनि में स्निग्धता पूर्व की अपेक्षा ज्यादा आ जाती है तथा श्रोणि क्षेत्र (pelvic region) में रक्त संचार ज्यादा होने से कसाव बेहतर रहता है. इसके विपरीत गर्भावस्था के प्रथम चरण अर्थात पहले 14 हफ्ते में महिलाएं सेक्स को लेकर कुछ भयभीत रहती है. क्योंकि इस दौरान उन्हें होने वाली थकान, उल्टी, मितलीआदि सेक्स इच्छा से दूर करती हैं इसी तरह तृतीय चरण मेंशरीर के भारीपन से होने वाली थकान, शारीरिक पीड़ा व पेट के खिंचाव व योनि क्षेत्र पर पडने वाले दबाव के दर्द से वे सेक्स से बचना चाहती है. लेकिन यदि महिलाओं को गर्भावस्था व सेक्स की जागरुकता हो तो इन अवस्थाओं को सामान्य तरीके से लेंगी और सेक्स से उनकी विरक्ति कम होती जाएगी. यह ध्यान देने योग्य है अंतिम चरण में सेक्स क्रिया काफी धीमे गति व संतुलित तरीके से करनी चाहिये.




गर्भावस्था की सेक्स पोजीशन :

गर्भधारण के बाद महिला-पुरुष दोनों ही सेक्स पोजीशन को लेकर परेशान होते हैं कि उनके लिये कौन सी सेक्स पोजीशन बेहतर होगी. यहां इसी समस्या का समाधान करने की कोशिश की गई है. लेकिन सेक्स पोजीशन जानने से पहले यह जरूर दिमाग में बैठा लें कि इस अवस्था में वहीं सेक्स पोजीशन प्रयोग में लाएं जिसमें आप गहराई और प्रवेश को नियंत्रित कर सकें.
1. स्पून पोजीशन : यह पोजीशन काफी आरामदायक और घनिष्टता या निकटता प्रदान करने वाली होती है. इसमें दोनों पार्टनर करवट के बल c की आकृति बनाते हुए एक ही दिशा में मुंह करके लेट जाएं. फिर पुरुष पीछे से प्रवेश क्रिया प्रारंभ करे. इस पोजीशन में महिला काफी आराम महसूस करती है तथा धक्कों को अपने तरीके से नियंत्रित कर सकती है. इस क्रिया में गर्भ को आधार मिला होता है जिससे महिला को अतिरिक्त वजन नहीं झेलना पड़ता. (देखेः चमचा पोजीशन)

2. महिला उपर होः यह पोजीशन ज्यादातर तब प्रयोग की जाती है जब गर्भावस्था का तीसरा चरण चल रहा होता है. इसमें नियंत्रण महिला के हाथ में होता है तथा महिला को धीरे चलने की अनुमति प्रदान करता है. यहां यह ध्यान रखे की प्रवेश ज्यादा गहरा न होने पाए. महिला चाहे तो इस दौरान उपर बैठने की अवस्था भी स्वीकार कर सकती है लेकिन इसमें प्रवेश गहरा हो जाता है. (देखेः जब महिला उपर हो)

3. आमने सामने : यह बड़े गर्भ वाली महिलाओं और गर्भावस्था के तीसरे चरण के लिये बेहतर पोजीशन है. इस पोजीशन में धक्के की गहराई और तीव्रता को नियंत्रित किया जा सकता है और गर्भ के वजन को हल्का किया जा सकता है.इसके लिये दोनों पार्टनर एक दूसरे की ओर चेहरा करके करवट के बल लेट जाएं फिर पुरुष अपने पैर को महिला के कूल्हों या जांघों के उपर रख कर एक एंगल से प्रवेश क्रिया करेगा इस दौरान महिला चाहे तो अपने पैर सीधे रख सकती है या घुटनों से पीछे मोड़ सकती है. इसमें सुविधा अनुसार परिवर्तन भी कर सकते हैं मसलन बगैर पैर चढ़ाए प्रवेश किया जा सकता है.(देखें: अगल बगल पोजीशन)

4.पीछे से प्रवेश : यह पोजीशन पुरुष को तेज धक्के की अनुमति देती है. यह शुरुआती चरण के लिये बेहतर पोजीशन है. इसमें महिला अपने हाथो के सहारे अपना एक पैर समकोण और दूसरा उसके कुछ दूर 45 अंश के कोण पर फैलाते हुए बिस्तर से उंचाई पर अपने को आधार देती है फिर पुरुष अपने घुटने के बल आकर प्रवेश क्रिया प्रारंभ करता है. (देखें: श्वान पोजीशन)

5. बैठी पोजीशन : यह पोजीशन एक बेहतरीन पोजीशन मानी जाती है. इसमें महिला किसी बिस्तर के किनारे या आराम कुर्सी पर बैठ जाती है फिर पुरुष या तो घुटनों के बल बैठ कर या खड़े होकर (सुविधानुसार) प्रवेश क्रिया को अंजाम देता है. इस दौरान पुरुष चाहे तो महिला के पांवों को अपने उपर रख सकता है. इस सेक्स पोजीशन में भी सुविधानुसार आप अपने परिवर्तन कर सकते हैं. (देखें:हर्षित पोजीशन)

6. बिस्तर का किनारा : यह पोजीशन काफी सुरक्षात्मक पोजीशन है लेकिन गर्भावस्था के तीसरे चरण में इसे नहीं करना चाहिए इससे तनाव होने से गर्भ को दिक्कत हो सकती है. इस पोजीशन के लिए महिला बिस्तर की कोर पर लेट जाती है इस दौरान उसके पैर जमीन पर होते है फिर पुरुष खड़े होकर या बिस्तर से हाथों को सहारा देते हुए झुककर प्रवेश कराता है. यह पोजीशन तीव्र धक्के की अनुमति देती है इस लिये सेक्स से पहले बता दें कि कितना धक्का आप सह सकती है.

7. महिला नीचे हो : यह पोजीशन हालांकि गर्भावस्था के लिये बेहतर नहीं मानी जाती है लेकिन कुछ महिलाएं इसे पसंद करती है. इस पोजीशन को प्रथम चरण तक ही इस्तेमाल करना चाहिये. चौथे माह के बाद इस पोजीशन को नहीं करना चाहिए. चौथे माह के बाद इस पोजीशन में असावधानी होने पर गर्भाशय का वजन गर्भाशय व पैर में पहुंचने वाली रक्त वाहिनियों को बाधित कर सकता है. इस पोजीशन के लिये महिला मिशनरी पोजीशन की तरह लेट जाती है तथा घुटनों पैर उठा लेती है ताकि पुरुष प्रवेश के दौरान जब नीचे आए तो गर्भ पर वजन न पड़े साथ ही धक्के नियंत्रित रह सकें. पुरुष भी महिला के उपर आकर घुटनों के उपर के भाग को सीधा रखते हुए प्रवेश करता है.
नोट- उपर दिया गया मैटर सेक्स शिक्षा के उद्देश्य से है. इसे चिकित्सकीय परामर्श या चिकित्सकीय सलाह के रूप में न ले. कोई समस्या होने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें.
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गर्भावस्था के दौरान परिवर्तन

पहला महीना: शारीरिक मासिक स्त्राव आना रुक जाता है. थकावट महसूस होना और हर समय नींद आना। जल्दी-जल्दी यूरिन का प्रेशर होना. जी मिचलाना, उल्टी आना या उल्टी की फीलिंग होना. स्लाइवा ज्यादा बनने लगता है. छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. भोजन के प्रति अरुचि या किसी चीज को खाने की तीव्र इच्छा होना. स्तनों में परिवर्तन, (जिन महिलाओं में माहवारी से पहले स्तनों में परिवर्तन होता है, उनके साथ ऐसा ज्यादा होता है) भारीपन, फूलना, जलन महसूस होना. अरीअॅला में कालापन बढ़ना (निप्पल के आसपास का हिस्सा). स्तनों में रक्त प्रवाह बढ़ने से त्वचा के अंदर हल्की नीली रेखाओं का जाल-सा बन जाता है. भावनात्मक मासिक धर्म से पहले के लक्षणों की तरह अस्थिरता, चिड़चिड़ापन, रोने का मन होना, अक्सर मूड का बदलते रहना. आशंकाओं से घिरना, भयभीत रहना, प्रसन्नता, उमंग से भरना-इनमें से कोई भी स्थिति हो सकती है.
दूसरा महीना:शारीरिक थकावट महसूस होना और हर समय नींद आना. जल्दी-जल्दी यूरिन का प्रेशर होना। जी मिचलाना, उल्टी आना या उल्टी की फीलिंग होना. स्लाइवा ज्यादा बनने लगता है. कब्ज, छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. भोजन के प्रति अरुचि या किसी चीज को खाने की तीव्र इच्छा होना. स्तनों में परिवर्तन, भारीपन, फूलना, जलन महसूस होना. अरीअॅला में कालापन बढ़ना. स्तनों में रक्त प्रवाह बढ़ने से त्वचा के अंदर हल्की नीली रेखाओं का जाल-सा बन जाता है. कभी-कभी सिरदर्द होना, कभी-कभी बेहोशी या चक्कर आना, कमर और स्तनों के आसपास उभार बढ़ना, पेट का आकार बढ़ना, गर्भाशय में वृद्धि होने से नहीं वरन कब्ज के कारण ऐसा होता है. भावनात्मक मासिक धर्म से पहले के लक्षणों की तरह अस्थिरता, चिड़चिड़ापन, रोने का मन होना, अक्सर मूड का बदलते रहना. आशंकाओं से घिरना, भयभीत रहना, प्रसन्नता, उमंग से भरना-इनमें से कोई भी स्थिति हो सकती है.
तीसरा महीना: शारीरिक थकावट महसूस होना और हर समय नींद आना. जल्दी-जल्दी यूरिन का प्रेशर होना। जी मिचलाना, उल्टी आना या उल्टी की फीलिंग होना. स्लाइवा ज्यादा बनने लगता है. कब्ज, छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. भोजन के प्रति अरुचि या किसी चीज को खाने की तीव्र इच्छा होना. स्तनों में परिवर्तन, भारीपन, फूलना, जलन महसूस होना. अरीअॅला में कालापन बढ़ना. स्तनों में रक्त प्रवाह बढ़ने से त्वचा के अंदर हल्की नीली रेखाओं का जाल-सा बन जाता है. कभी-कभी सिरदर्द होना, कभी-कभी बेहोशी या चक्कर आना, कमर और स्तनों के आसपास उभार बढ़ना, पेट का आकार बढ़ना, गर्भाशय में वृद्धि होने से नहीं वरन कब्ज के कारण ऐसा होता है. भावनात्मक मासिक धर्म से पहले के लक्षणों की तरह अस्थिरता, चिड़चिड़ापन, रोने का मन होना, अक्सर मूड का बदलते रहना. आशंकाओं से घिरना, भयभीत रहना, प्रसन्नता, उमंग से भरना-इनमें से कोई भी स्थिति हो सकती है. अपने भीतर एक सुकून का अहसास होना.
चौथा महीना: शारीरिक थकावट, यूरिन के जल्दी-जल्दी आने में कमी, जी मिचलाना और उल्टी आना कम या बंद हो जाना. (कई महिलाओं में मार्निग सिकनेस बनी रहती है, कई महिलाओं में इसकी शुरुआत होती है) कब्ज,छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. स्तनों के आकार में निरंतर वृद्धि, लेकिन सूजन में कमी। कभी-कभी सिरदर्द होना. मसूढ़े नरम हो जाने की वजह से ब्रश करते समय खून आ सकता है, भूख का बढ़ना. पैरों, चेहरे व हाथों में सूजन आना. कब्ज और ज्यादा रक्त प्रवाह के कारण इस समय बवासीर हो सकती है. योनि मार्ग से थोड़ा-सा सफेद स्त्राव बह सकता है. इससे खुजली होना भी सामान्य है. महीना खत्म होने के दौरान भ्रूण का हिलना महसूस होना. भावनात्मक मासिक धर्म से पहले के लक्षणों की तरह अस्थिरता, चिड़चिड़ापन, रोने का मन होना, अक्सर मूड का बदलते रहना. स्वयं को गर्भवती मानने के कारण खुशी महसूस होना. स्वयं के बढ़ते आकार को लेकर चिंतित होना. स्वयं को बिखरा-बिखरा महसूस करना, चीजों को रखकर भूलना, हाथ से सामान का गिर जाना, किसी काम में मन न लगना.
पांचवा महीना: शारीरिक बच्चे का हिलना, योनि मार्ग से सफेद स्त्राव के आने की मात्रा बढ़ना. शरीर में खुजली होना, खासकर पेट के निचले हिस्से में. कब्ज, छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. कभी-कभी सिरदर्द होना, बेहोशी या चक्कर आना. मसूढ़े नरम हो जाने की वजह से ब्रश करते समय खून आ सकता है. बहुत ज्यादा भूख लगना. टांगों में ऐंठन होना. एडि़यों और पैरों में हल्की सूजन, कभी-कभी चेहरे व हाथों में भी सूजन आना. कब्ज और ज्यादा रक्त प्रवाह के कारण इस समय बवासीर हो सकती है. नब्ज की गति में वृद्धि होना. सेक्स में कम या ज्यादा रुचि होना. कमर में दर्द, चेहरे या पेट के रंग में बदलाव आना. भावनात्मक गर्भावस्था की स्थिति को स्वीकारना, मूड के बदलाव में कमी आना, लेकिन चिड़चिड़ापन कायम रहना. किसी काम में मन न लगना.
छठा महीना: शारीरिक बच्चे के हिलने में वृद्धि होना. सफेद स्त्राव का बहना. शरीर में खुजली होना, खासकर पेट के निचले हिस्से में. कब्ज, छाती में जलन, बदहजमी, गैस बनना. कभी-कभी सिरदर्द होना, बेहोशी या चक्कर आना. मसूढ़े नरम हो जाने की वजह से ब्रश करते समय खून आ सकता है. बहुत ज्यादा भूख लगना. टांगों में ऐंठन होना, एडि़यों और पैरों में हल्की सूजन. कभी-कभी चेहरे व हाथों में भी सूजन आना. कब्ज और ज्यादा रक्त प्रवाह के कारण इस समय बवासीर हो सकती है. पेट में खुजली होना. कमर में दर्द, चेहरे या पेट के रंग में बदलाव आना. स्तनों के आकार में वृद्धि होना. भावनात्मक मूड के बदलाव में कमी आना, काम में मन न लगना. गर्भावस्था के कारण बोरियत का शुरू होना. (यह सोचकर कि इसके सिवाय किसी और चीज पर ध्यान ही नहीं लगा सकते) भविष्य को लेकर चिंतित रहना.
सातवां-आठवां महीना: शारीरिक बच्चे का ज्यादा तीव्रता से पेट में घूमना. योनि मार्ग से सफेद स्त्राव के बहाव में वृद्धि होना. पेट के निचले हिस्से में खुजली होना. कब्ज, छाती में जलन, बदहजमी, गैस होना। कभी-कभी सिरदर्द होना, बेहोशी या चक्कर आना. मसूढ़े नरम हो जाने की वजह से ब्रश करते समय खून आ सकता है. टांगों में ऐंठन, कमर में दर्द। एडि़यों और पैरों में हल्की सूजन. कभी-कभी चेहरे व हाथों में भी सूजन आना. कब्ज और ज्यादा रक्त प्रवाह के कारण इस समय बवासीर हो सकती है. पेट के निचले हिस्से में खुजली. सांस लेने में दिक्कत आना, सोने में मुश्किल महसूस होना. दर्दरहित ब्रेक्सटन हिक्स कांट्रेक्शंस (यूट्रस कुछ सेकेंड के लिए सख्त होता है, फिर सामान्य अवस्था में आ जाता है). बढ़े हुए स्तनों से कोलोस्ट्रम (एक प्रकार का तरल) का निकलना. भावनात्मक अपने और बच्चे के स्वास्थ्य और प्रसव के बारे में सोचकर आशंकित रहना. किसी भी काम में मन न लगना. बोरियत और थकावट का बढ़ना. इस स्थिति के खत्म होने का इंतजार. इस बात की खुशी होना कि बच्चे के जन्म में देर नहीं है।
नौवां महीना: शारीरिक बच्चे की गतिविधि में बदलाव. योनि मार्ग से निकलने वाला सफेद स्त्राव में म्यूकस की मात्रा का बढ़ जाना. कब्ज, छाती में जलन बढ़ना, बदहजमी, वायु का होना. कभी-कभी सिरदर्द होना, बेहोशी और चक्कर आना. मसूढ़ों से खून आना. सोते समय टांगों में ऐंठन होना, कमर दर्द का बढ़ना और भारीपन महसूस होना. हिप्स और पेल्विक में परेशानी व खुजली. पैरों, चेहरे व हाथों में सूजन आना. पेट के निचले हिस्से में खुजली, नाभि का बढ़ना, योनि द्वार में सूजन हो सकती है. कब्ज और ज्यादा रक्त प्रवाह के कारण इस समय बवासीर हो सकती है. सोने में परेशानी बढ़ना. ब्रेक्सटन हिक्स कांट्रेक्शंस का ज्यादा बढ़ना. शरीर के आकार के बढ़ने से चलने-फिरने में दिक्कत आना. बढ़े हुए स्तनों से कोलोस्ट्रम का निकलना. भूख का बढ़ना या भूख कम लगना। भावनात्मक ज्यादा उत्साह, चिंता, आशंकाएं, अस्थिरता का बढ़ना. इस बात की खुशी कि अब जल्द ही यह अवस्था खत्म होने वाली है. बेचैनी और अधीरता. बच्चे के बारे में कल्पना करना( यह मैटर हैदराबाद से दीपिका शाही ने भेजा है. इसमें किसी गलती के लिए ब्लाग ऑनर जिम्मेदार नहीं है. उसे यथा स्थिति प्रकाशित कर दिया गया है)



5 comments:

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